
🚗महिंद्रा वर्कशॉप की ‘गुंडई’ और खाकी का ‘खौफनाक’ चेहरा: क्या योगीराज में सुरक्षित हैं उपभोक्ता?🚗
🚓गोरखपुर में उपभोक्ता अधिकारों का कत्ल: नौसढ़ चौकी की भूमिका संदिग्ध, पीड़ित ने प्रेस क्लब में खोला मोर्चा।
🚓स्कॉर्पियो की सर्विसिंग और सिस्टम की ‘सर्विसिंग’: पक्का बिल मांगने पर चौकी पहुँचाया, बीमार माँ तड़पती रही!
ब्यूरो रिपोर्ट: अजीत मिश्रा (खोजी)
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और अपराध पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार के नाक के नीचे, गोरखपुर का नौसढ़ इलाका ‘अन्याय का गढ़’ बनता जा रहा है। मामला सिंह सरदार मोटर्स (महिंद्रा अधिकृत वर्कशॉप) का है, जहाँ एक उपभोक्ता को अपनी ही गाड़ी की सर्विसिंग के बाद पक्का बिल माँगना इतना भारी पड़ गया कि उसे न्याय के लिए प्रेस क्लब का दरवाजा खटखटाना पड़ा। यह सिर्फ एक ग्राहक की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीएसटी की चोरी, वर्कशॉप प्रबंधन की दबंगई और स्थानीय पुलिस की संदिग्ध कार्यप्रणाली का एक ऐसा कॉकटेल है, जो सीधे तौर पर शासन-प्रशासन को चुनौती दे रहा है।
💫कच्चे बिल का ‘काला खेल’ और जीएसटी की सरेआम चोरी
पीड़ित आलोक कुमार यादव की स्कॉर्पियो-एन (UP53 EN 9873) की सर्विसिंग के बाद जब उन्होंने भुगतान किया, तो उन्हें पक्के जीएसटी बिल के बजाय ‘कच्चा कागज’ थमा दिया गया। सवाल यह है कि क्या महिंद्रा जैसी प्रतिष्ठित कंपनी के नाम पर करोड़ों का टर्नओवर करने वाली यह वर्कशॉप सरकारी राजस्व को चूना लगा रही है? खुद वर्कशॉप के जीएम ने स्वीकार किया कि पिछले 6-7 सालों से उनका ऑडिट लंबित है और बिलिंग में भारी गड़बड़ी है। यह स्वीकारोक्ति खुद में एक बड़ा घोटाला है। क्या जीएसटी विभाग की मिलीभगत के बिना इतने वर्षों तक यह फर्जीवाड़ा चल सकता है?
🚨रक्षक या भक्षक? नौसढ़ चौकी की भूमिका पर सवाल
हैरानी की बात तब हुई जब पीड़ित ने अपने हक की आवाज उठाई, तो वर्कशॉप प्रबंधन ने पुलिस को बुला लिया। डायल 112 और नौसढ़ चौकी की पुलिस ने जिस तत्परता से पीड़ित को ही अपराधी की तरह चौकी पहुँचाया, वह पुलिसिया कार्यशैली पर गहरा दाग है। पीड़ित का आरोप है कि चौकी इंचार्ज ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। क्या अब उत्तर प्रदेश में पक्का बिल माँगना ‘अपराध’ की श्रेणी में आता है? जब पीड़ित अपनी ही गाड़ी का वीडियो बनाना चाहता था, तो पुलिस ने उसे क्यों रोका? क्या पुलिस वर्कशॉप के ‘मैनेजर’ की भूमिका निभा रही थी?
😇बीमार माँ को तड़पाया, सिस्टम ने रुलाया
वर्कशॉप और पुलिस की इस जुगलबंदी का खामियाजा पीड़ित के परिवार को भुगतना पड़ा। गाड़ी न मिलने के कारण पीड़ित को अपनी बीमार माता जी को दूसरे वाहन से अस्पताल भेजना पड़ा। एक तरफ सरकार ‘मित्र पुलिस’ का नारा देती है, वहीं दूसरी तरफ नौसढ़ चौकी के व्यवहार ने एक नागरिक को इतना डरा दिया है कि उसे अपनी सुरक्षा की चिंता सता रही है।
✍️प्रशासन के सामने तीखे सवाल:
⚡जीएसटी विभाग मौन क्यों? अगर 6-7 साल से ऑडिट नहीं हुआ और कच्चे बिल पर काम चल रहा है, तो विभाग के अधिकारी क्या सो रहे हैं?
🙈महिंद्रा कंपनी की साख का क्या? क्या आनंद महिंद्रा जानते हैं कि उनके नाम पर गोरखपुर में ग्राहकों के साथ मारपीट और बदसलूकी हो रही है?
⚡एसएसपी गोरखपुर संज्ञान लेंगे? क्या उन पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने एक सम्मानित नागरिक को चौकी ले जाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया?
निष्कर्ष:
यह मामला केवल एक वर्कशॉप के विवाद का नहीं है, बल्कि उन हजारों उपभोक्ताओं के अधिकारों का है जिन्हें रसूखदार संस्थान और भ्रष्ट तंत्र मिलकर कुचलते हैं। यदि पीड़ित को उसकी गाड़ी पुलिस सुरक्षा में नहीं दिलाई गई और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि गोरखपुर में कानून का नहीं, बल्कि ‘सिंडिकेट’ का राज है।



















